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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

चित्रगुप्त सेना जबलपुर द्वारा निशुल्क चिकित्सा शिविर.

चित्रगुप्त सेना जबलपुर द्वारा निशुल्क चिकित्सा शिविर.


जबलपुर. असी-मसिजीवी कायस्थ समाज के तरुणों की प्रतिनिधि संस्था चित्रगुप्त सेना के तत्वावधान में निशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन संपन्न हुआ. सचिव श्री देवेन्द्र वर्मा ने कायस्थवाद को मानवतावाद के रूप में परिभाषित करते हुए निर्धन लोगों को चिकित्सा प्रदान करने के उद्देश्य से इस आयोजन को अपरिहार्य बताया. डॉ. ललित श्रीवास्तव, डॉ, यश श्रीवास्तव, डॉ. जे. पी. खरे आदि ने उपस्थित रोगियों की निशुल्क जाँच कर औषधियां प्रदान कीं.
मुख्या अतिथि चित्रांश इं. संजीव वर्मा 'सलिल' ने मानव सेवा को माधव सेवा बताए हुए कायस्थवाद को मानवतावाद के रूप में परिभाषित करते हुए ऐसी गतिविधियों को सामजिक चेतना कहते हुए आयोजकों का अभिनंदन किया.

रविवार, 16 जनवरी 2011

सामयिक चर्चा: कायस्थ कौन हैं? -- संजीव वर्मा 'सलिल'

सामयिक चर्चा: 
 
कायस्थ कौन हैं?
 
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
जिसकी काया में ''वह'' (परात्पr परम्ब्रम्ह जो निराकार है, जिसका चित्र गुप्त है, जो हर चित्त में गुप्त है) स्थित है, जिसके निकल जाने पर कहें कि 'मिट्टी' जा रही है- वह कायस्थ है. इस सृष्टि में उपस्थित सभी चर-अचर, दृष्ट-अदृष्ट कायस्थ है. व्यावहारिक या सांसारिक अर्थ में जो इस सत्य को जानते और मानते हैं वे 'कायस्थ' है.

इसी लिए कहा गया "कायथ घर भोजन करे बचे न एकहु जात'' जिस प्रकार गंगा में स्नान से सही नदियों में स्नान का सुख मिल जाता है, वैसे ही कायस्थ के घर में भोजन करने से हर जाति के घर में भोजन करने अर्थात सबसे रोटी-बेटी सम्बन्ध की पात्रता हो जाती है.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

'गोत्र' तथा 'अल्ल' acharya sanjiv 'salil'

'गोत्र' तथा 'अल्ल'

'गोत्र' तथा 'अल्ल' के अर्थ तथा महत्व संबंधी प्रश्न राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के नाते मुझसे भी पूछे जाते हैं.

स्कन्दपुराण में वर्णित श्री चित्रगुप्त प्रसंग के अनुसार उनके बारह पत्रों को बारह ऋषियों के पास विविध विषयों की शिक्षा हेतु भेजा गया था. इन से ही कायस्थों की बारह उपजातियों का श्री गणेश हुआ. ऋषियों के नाम ही उनके शिष्यों के गोत्र हुए. इसी कारण विभिन्न जातियों में एक ही गोत्र मिलता है चूंकि ऋषि के पास विविध जाती के शिष्य अध्ययन करते थे. आज कल जिस तरह मॉडल स्कूल में पढ़े विद्यार्थी 'मोडेलियन' रोबेर्त्सों कोलेज में पढ़े विद्यार्थी 'रोबर्टसोनियन' आदि कहलाते हैं, वैसे ही ऋषियों के शिष्यों के गोत्र गुरु के नाम पर हुए. आश्रमों में शुचिता बनाये रखने के लिए सभी शिष्य आपस में गुरु भाई तथा गुरु बहिनें मानी जाती थीं. शिष्य गुरु के आत्मज (संततिवत) मान्य थे. अतः, उनमें आपस में विवाह वर्जित होना उचित ही था.

एक 'गोत्र' के अंतर्गत कई 'अल्ल' होती हैं. 'अल्ल' कूट शब्द (कोड) या पहचान चिन्ह है जो कुल के किसी प्रतापी पुरुष, मूल स्थान, आजीविका, विशेष योग्यता, मानद उपाधि या अन्य से सम्बंधित होता है. एक 'अल्ल' में विवाह सम्बन्ध सामान्यतया वर्जित मन जाता है किन्तु आजकल अधिकांश लोग अपने 'अल्ल' की जानकारी नहीं रखते. हमारा गोत्र 'कश्यप' है जो अधिकांश कायस्थों का है तथा उनमें आपस में विवाह सम्बन्ध होते हैं. हमारी अगर'' 'उमरे' है. मुझे इस अल्ल का अब तक केवल एक अन्य व्यक्ति मिला है. मेरे फूफा जी की अल्ल 'बैरकपुर के भले' है. उनके पूर्वज बैरकपुर से नागपुर जा बसे.

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

कायस्थ - प्रतिभा

pratibha_saksena@yahoo.com

'चित्त-चित्त में गुप्त हैं, चित्रगुप्त परमात्म.

गुप्त चित्र निज देख ले,'सलिल' धन्य हो आत्म.'


आचार्य जी,

'गागर मे सागर' भरने की कला के प्रमाण हैं आपके दोहे । नमन करती हूँ !


उपरोक्त दोहे से अपनी एक कविता याद आ गई प्रस्तुत है -

कायस्थ

. कोई पूछता है मेरी जाति

, मुझे हँसी आती है

, मैं तो काया में स्थित आत्म हूँ !

न ब्राह्मण, न क्षत्री, न वैश्य, न शूद्र ,

कोई जाति नहीं मेरी,

लोगों ने जो बना रखी हैं !

मैं नहीं जन्मा हूँ मुँह से,

न हाथ से, न पेट से, न पैर से,

किसी अकेले अंग से नहीं !

उस चिद्आत्म के पूरे तन

और भावन से प्रकटित

स्वरूप- मैं,

सचेत, स्वतंत्र,निर्बंध!

सहज मानव, पूर्वाग्रह रहित!

मुझे परहेज़ नहीं नये विचारों से,

ढाल लेता हूँ स्वयं को

समय के अनुरूप !

पढ़ता-लिखता,

सोच-विचार कर

लेखा-जोखा करता हूँ

इस दुनिया का !

रचा तुमने,

चेतना का एक चित्र

जो गुप्त था तुम्हारे चित्त में,

ढाल दिया उसे काया में!

कायस्थ हूँ मैं!

प्रभु!अच्छा किया तुमने,

कि कोई जाति न दे

मुझे कायस्थ बनाया !

- प्रतिभा.
************
ambarishji@gmail.com की छवियां हमेशा प्रदर्शित करें


आदरणीय आचार्य जी ,

महराज चित्रगुप्त को नमन करते हुए मैं आदरणीया प्रतिभा जी से प्रेरित होकर की राह में चल रहा हूँ

कायस्थ

मनुज योनि के सृजक हैं, ब्रह्माजी महराज

सकल सृष्टि उनकी रची, उनमें जग का राज

मुखारबिंदु से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय पूत

वैश्य जनम है उदर से, जंघा से सब शूद्र

धर्मराज व्याकुल हुए, लख चौरासी योनि

संकट भारी हो रहा, लेखा देखे कौन

ब्रह्माजी को तब हुआ, भगवन का आदेश

ग्यारह शतकों तप करो , प्रकटें स्वयं यमेश

काया से उत्त्पन्न हैं, कहते वेद पुराण

व्योम संहिता में मिले , कुल कायस्थ प्रमाण

चित्त साधना से हुए , गुप्त रखें सब काम

ब्रह्माजी नें तब रखा, चित्रगुप्त शुभ नाम

ब्राह्मण सम कायस्थ हैं , सुरभित सम सुप्रभात

ब्रह्म कायस्थ जगत में, कब से है विख्यात

प्रतिभा शील विनम्रता, निर्मल सरस विचार

पर-उपकार सदाचरण, इनका है आधार

सबको आदर दे रहे, रखते सबका मान

सारे जग के मित्र हैं, सदगुण की ये खान

दुनिया में फैले सदा, विद्या बिंदु प्रकाश

एक सभी कायस्थ हों, मिलकर करें प्रयास

कायस्थों की कामना, सब होवें कायस्थ

सूर्य ज्ञान का विश्व में, कभी ना होवे अस्त

सादर,

--अम्बरीष श्रीवास्तव (Architectural Engineer)

91, Agha Colony, Civil Lines Sitapur (U. P.)Mobile 09415047020