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मंगलवार, 17 मार्च 2009

चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'

चित्र-चित्र में गुप्त जो, उसको विनत प्रणाम।
वह कण-कण में रम रहा, तृण-तृण उसका धाम ।

विधि-हरी-हर उसने रचे, देकर शक्ति अनंत।
वह अनादि-ओंकार है, ध्याते उसको संत।

कल-कल,छन-छन में वही, बसता अनहद नाद।
कोई न उसके पूर्व है, कोई न उसके बाद।

वही रमा गुंजार में, वही थाप, वह नाद।
निराकार साकार वह, उससे सृष्टि निहाल।

'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. चित्रवंशियों का सदा,

    रखते हैं जो ध्यान।

    रमें हुए हैं जगत में,

    बन कर कृपा निधान।

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  2. wah sanjeev ji umda rachna, sarahniya.
    'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
    उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।
    badhai sweekaren. iske saath hi mere blog par, aagman aur comment ke liye dhanyawaad. punah padharen.

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  3. ापकी रचनाओम ने तो मन मोहा ही है अपके ब्लोग ने भी मन मोह लिया है आपका लघुकथा ब्लोग भी मन को छूत है नया और लाज़वाब अंदाज़ बधाई

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  4. mai pahli baar aapke blog par aaya hoon kaaphi achchha laga...bahut saari jaankaariyan milegi ...

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  5. पहले तो मै आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हू कि आपको मेरी शायरी पसन्द आयी !
    आप तो बहुत ही सुन्दर लिखते है और मेरा ये मान्ना है कि आप बडे ही उन्दा लेखक है !

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  6. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ की आपको मेरा खाना मसाला ब्लॉग पसंद आया! लगता है आपकी भी मेरे जैसे खाने के बहुत शौकीन है!
    आपने बहुत ही सुंदर लिखा है! लिखते रहिये और हम रोजाना पड़ते रहेंगे!

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  7. उपयोगी जानकारी देने के लिये बधाई. मेरे ब्लौग पर आने और समर्थन के लिये दिल से आभारी हूं.स्नेह बनाये रखें.

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  8. आचार्य जी ,
    आपका मेल मिला था गुरु नानक के दोहे अनुवाद के लिए ...पर इस बीच व्यस्तता के कारन मैं देख ही नहीं पाई ...पर आपने तो सरे भावः बहुत अच्छे से बता ही दिए हैं..... आप जैसे गुनी ज्ञानी के आगे हमारी क्या मिसाल....आपके दोहे तो लाजवाब होते हैं....आस है आप अन्यथा नहीं लेंगें ......!!

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  9. ऊँ श्री चित्रगुप्ताय नमो नम:

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